Devil की दास्तान - 42

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घना जंगल। रात का समय। चारों तरफ़ ठंडी हवा बह रही है। चाँद आधा ढका हुआ है। पेड़ों की शाखाएँ अजीब आवाज़ें कर रही हैं।"(कबीर अपनी बाँहों में सिया को उठाए धीरे-धीरे चल रहा है। उसके कपड़े फटे हुए हैं, और सिया का चेहरा अब पूरी तरह ज़ॉम्बी में बदल चुका है — नीली नसें, धुँधली आँखें, और होंठों पर सूखा ख़ून।)कबीर (धीरे, टूटे स्वर में) बोला - “अब मैं तुम्हें किसी के सामने नहीं आने दूँगा, सिया…ना इंसान के, ना शैतान के, ना इन जॉम्बीज़ के…”(वो चारों तरफ़ देखता है — हवा में सड़न की बदबू है। दूर से कुछ