विरोध नहीं, जागरण

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 विरोध नहीं, जागरणकेवल बात करने से यदि सब कुछ संभव होता, तो यह संसार कब का स्वर्ग बन गया होता। समाज में सदियों से प्रवचन हैं, नियम हैं, कानून हैं, संस्थाएँ हैं, आंदोलन हैं, विरोध हैं। मनुष्य को लगातार बताया जाता रहा है—यह करो, यह मत करो; यह अच्छा है, यह बुरा है; प्रेम करो, दया करो, अहिंसा रखो। फिर भी मनुष्य के भीतर वही संघर्ष अलग-अलग रूपों में लौटता रहता है।इसका अर्थ यजो ह नहीं कि कानून, नियम या सामाजिक विरोध का कोई मूल्य नहीं। वे बाहर की व्यवस्था को कुछ सीमा तक नियंत्रित कर सकते हैं। लेकिन वे