सावन

सावन की दोपहर लगभग आधी खत्म हो चुकी थी और ढलते सूरज की सुन्हरी रोशनी से नीम की काली छाया और लम्बी हो चली थी। इसी नीम की छाया में लखपत अपनी चारपाई पर औंधे मुंह लेटा हुआ था। काफी देर से सोने की कोशिश कर रहा था पर नींद मानो उससे कोसो दूर चली गई थी। काफी देर तक ऐसे ही लेटे रहने के बाद वो उठ बैठा और अलसाई हुई नजरों से अपने घर की ओर देखने लगा। घर के आंगन में उसकी पत्नी निम्मो भैसों के लिए चारा डाल रही थी। चारपाई से उठ कर लखपत पत्नी