संयोगिता अपने cabin में अकेली बैठी थी। सामने laptop खुला था…लेकिन उसकी नजरें screen पर नहीं थीं। वो कहीं और खोई हुई थी। उसके दिमाग में बार-बार वही रात घूम रही थी संपूर्णा…उसकी बाँहों में खून से लथपथ पड़ी हुई। उसकी टूटती साँसें।और फिर—मेरे पति और मेरे बच्चे का ख्याल रखना…संयोगिता ने आँखें बंद कर लीं। उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे काँप गईं। वो जितना उस वादे से दूर भागना चाहती थी…उतना ही वो उसके करीब आती जा रही थी। Virat की टूटी आँखें। विवान की मासूम आवाज़। सब उसके अंदर जगह बनाते जा रहे थे।और यही चीज़ उसे सबसे ज्यादा डराती