अन्तर्निहित - 57

  • 498
  • 120

[57]शैल के शब्दों ने दोनों को चौंकाया। क्षणभर दोनों अवाक होकर परस्पर देखते रहे। “ऐसा नहीं है, शैल।” निहारिका ने नम्र होकर कहा। “तो क्या चाहते हो? इस प्रकार हमारे मार्ग में बार बार आकर क्या सिद्ध करना चाहते हो?” सरिता ने उग्रता से कहा। “हम तो आप दोनों की दीक्षा चाहते हैं।” निहारिका ने मीठे स्वर में कहा। “दीक्षा? कैसी दीक्षा?” “सन्यास लेने का मेरा कोई आयोजन नहीं है। न ही कोई प्रयोजन है मेरा।”“नहीं शैल, आपके धर्म की सन्यास वाली वह दीक्षा नहीं।”“तो कौन सी दीक्षा?”“हमारे मिशन की दीक्षा, हमारे अभियान की दीक्षा, सरिता जी।”“वह क्या है?”“दीक्षा लेते ही हमारा मिशन आपको समझ