एक पुरुष—सबके बीच अकेला - 1

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भाग १ — एक दिन, कई जिम्मेदारियाँसुबह छह बजे अलार्म बजा।मिहिर ने आँखें खोलीं, लेकिन कुछ क्षणों तक बिस्तर पर ही पड़ा रहा।बगल में उसकी पत्नी निशा अभी सो रही थी। सामने की दीवार पर घड़ी की सुइयाँ तेजी से आगे बढ़ रही थीं।छह बजकर पाँच मिनट।मिहिर ने गहरी साँस ली और बिस्तर से उठ गया।“आज भी देर हो जाएगी,” उसने खुद से कहा।रसोई से बर्तनों की आवाज़ आने लगी थी।“मिहिर, चाय रख देना,” पीछे से उसकी माँ की आवाज़ आई।“हाँ माँ।”वह रसोई में गया।गैस जलाई। चाय रखी। मोबाइल में ऑफिस के मैसेज चेक किए।पाँच नए मैसेज।दो क्लाइंट के।एक बॉस