लोग अक्सर ऐसा क्यों चाहते हैं कि हम उनके मन के मुताबिक ही चलें । जो उन्हें अच्छा लगे वही करें, वही पहनें, वही कहें । कभी ये रंग तुम पर जांचता नहीं है, मत पहना करो । कभी तुम्हारे माथे पर छोटी बिंदी अच्छी लगती है, बड़ी मत लगाया करो । क्यों ....? मैं जो करूँगी वो आपसे पूछकर कटों करूँगी ? या आपके अनुसार क्यों रहूँगी ? मेरा जीवन है , मेरे सपने हैं, मेरा आसमान है । मैं अपने आत्मबल से उड़ान भरना चाहती हूँ तो किसी की क्यों सुनूँ ? मैं जैसी हूँ वैसी ही रहूँगी ।