अतृप्त देह

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शहर के एक पॉश अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी सुनैना जब रात के सन्नाटे को देखती, तो उसकी अपनी सांसों की गर्माहट उसे बेचैन कर देती। बत्तीस साल की उम्र में पति को खोने के बाद दुनिया ने उस पर सादगी और संन्यास का जो लबादा ओढ़ा दिया था, वह उसकी रगों में दौड़ते लहू को ठंडा नहीं कर सका था। समाज के लिए वह एक शांत और संभ्रांत विधवा थी, लेकिन बंद दरवाजों के पीछे उसकी देह स्पर्श, सुख और तृप्ति की एक गहरी आग में झुलस रही थी।उसकी इस गुप्त यात्रा का पहला सिरा विक्रम था। विक्रम उसके