रिश्तों का बोझएक कहानी — जब रिश्ते सहारा बनने के बजाय बोझ बन जाएँशहर के एक पुराने मोहल्ले में एक छोटा-सा दो मंजिला मकान था। मकान बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उसमें रहने वाले लोगों के सपने बहुत बड़े थे। उस घर के मुखिया थे—रघुनाथ प्रसाद।रघुनाथ जी ने अपनी पूरी जिंदगी अपने परिवार के लिए लगा दी थी। सरकारी नौकरी छोटी थी, वेतन सीमित था, लेकिन बच्चों की इच्छाएँ कभी छोटी नहीं हुईं।उनकी पत्नी सावित्री हमेशा कहा करती थीं—“बच्चों के लिए जो कर सकते हो, कर दो। आखिर बुढ़ापे में यही बच्चे हमारा सहारा बनेंगे।”रघुनाथ मुस्कुरा देते।“हाँ सावित्री, बच्चे ही