पाँच वर्ष बीत गए थे।समय के बारे में सबसे विचित्र बात यही है,जिस दिन हम टूटते हैं, उस दिन लगता है कि अब कुछ आगे नहीं बढ़ेगा।लेकिन समय रुकता नहीं।वह हमारी सहमति के बिना भी आगे बढ़ता रहता है।पाँच वर्षों में शहर बदल गया था।कुछ सड़कें चौड़ी हो गई थीं।पुरानी इमारतें गिराकर नई बना दी गई थीं।कई चेहरे चले गए थे।कई नए आ गए थे।लेकिन शहर के पुराने हिस्से में वह छोटी-सी किताबों की दुकान अब भी थी।हालाँकि मोहनलाल जी नहीं रहे थे।उनके बेटे ने दुकान संभाल ली थी।और महीने में एक बार...लगभग हर महीने...समर वहाँ आता था।अब उसके बालों