प्रतीकोपासना :-आत्मज्योति से नाद और लय तकभाग ३ : नाद का अनुभव और चित्त का विलयप्रतीकोपासना की साधना अब उस बिंदु पर पहुँच चुकी है जहाँ साधक का ध्यान बाहरी प्रतीक से आगे बढ़कर भीतर की ओर स्थिर हो चुका है। पहले अपने प्रतिबिंब को स्वप्रतीक बनाकर उसका अभ्यास किया गया, फिर उसी प्रतीक का आकाश में दर्शन, हृदयाकाश में उसके भान की अवस्था, इंद्रिय-निरोध और वायु-निरोध के द्वारा चित्त को अंतर्मुख करने की प्रक्रिया आई। इसके बाद आत्मा को ज्योतिरूप में देखने और निरंतर अभ्यास के द्वारा आत्मस्वरूप में अभिन्न होने की बात कही गई।अब शिवसंहिता साधना के एक