प्रतीकोपासना :- इंद्रिय-निरोध से आत्मज्योति तकभाग २ : भीतर की ओर मुड़ती साधनाप्रतीकोपासना के पहले चरण में साधक अपने ही प्रतिबिंब को स्वप्रतीक बनाकर उसका अभ्यास करता है। पहले अपने प्रतिबिंब का दर्शन, फिर आकाश में उसी प्रतीक को देखने का अभ्यास और निरंतर साधना के द्वारा हृदयाकाश में स्वप्रतीक के भान की बात कही गई है। इस प्रकार साधना धीरे-धीरे बाहरी दृश्य से भीतर के अनुभव की ओर बढ़ती है।अब शिवसंहिता इसी साधना को एक और गहरे स्तर पर ले जाती है। यहाँ साधक को अपनी इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर भीतर की ओर स्थिर करने की एक