बनारस की ख़ामोशी - 3

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ज्यों ज्यों समय बीत रहा था… सब कुछ ठीक था। मैं अपने बीते दिनों को भी भूल चुकी थी, और उस बात को भी, जिसे दीपक छुपा रहा था। मैं बहुत खुश थी, कि दीपक अब मेरे साथ ही रहेगा। फाइनल ईयर के पेपर खत्म होने के बाद हमने शादी करने का फैसला लिया। हमने सोचा दीपक एक अच्छी सी नौकरी कर लेगा। मैं घर पर ही बच्चों को ट्यूशन दूंगी। ये सब सोचने में कितना अच्छा लग रहा था। एक खूबसूरत दुनिया की कल्पना में जीने लगी।लेकिन जैसा हम सोचते हैं, असल में सब उसका उल्टा होता है। हम चाहे कितनी