कालू की आवाज़ किसी फटे हुए नगाड़े की तरह गूँजी। उसका क्रोध अब सातवें आसमान पर था। उसकी काली छाया के भीतर से बिजली जैसी लपटें निकलने लगीं।"बता कार्तिक! कौन है वह जिसने प्रेमचंद बनकर मेरी पीठ में खंजर घोंपा? और कहाँ है वह मीना, जिसके लिए मैंने अपना सब कुछ लुटा दिया? मैं उनके टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा! उन्हें इस पहाड़ी की मिट्टी में चबा जाऊँगा!" कालू की आँखों से दहकता हुआ लावा जैसे उबल रहा था।कार्तिक ने अपना संतुलन बनाए रखा और अस्थि-कलश को कालू की आँखों के ठीक सामने कर दिया। कलश की पवित्र चमक ने कालू को एक