उस रात वह सो नहीं पाया।अजीब बेचैनी थी।जैसे हृदय किसी ऐसी बात को पहले से जानता हो जिसे बुद्धि अभी स्वीकार नहीं करना चाहती।सुबह चार बजे उसका फ़ोन बजा।अस्पताल से कॉल थी।और उसके बाद की कुछ बातें उसे जीवन भर धुँधली ही याद रहीं।सड़क....अँधेरा......तेज़ चलती गाड़ी.....खाली गलियारा....और फिर...एक शांत कमरा। क्या कुछ नहीं देखा था उसने.... क्या कुछ नहीं सहा था?फ़ोन कट चुका था।लेकिन समर अब भी उसे कान से लगाए बैठा था।जैसे उम्मीद कर रहा हो कि अभी दूसरी तरफ़ से कोई आवाज़ आएगी।"माफ़ कीजिए... ग़लती हो गई थी। वह ठीक है।"मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ।वह मशीन की तरह