एक आखिरी चिट्ठी - उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे - मोहनपुरा में, एक बहुत पुराना डाकघर था। उस डाकघर की लाल ईंटों पर बरसात के पानी के निशान थे, और उसके बाहर एक बूढ़ा पीपल का पेड़ था। उसी डाकघर में पिछले 35 सालों से काम करते थे - रामप्रसाद।रामप्रसाद अब 62 साल के थे। उनके बाल पूरे सफेद हो चुके थे, चश्मा मोटा हो गया था, पर उनकी साइकिल आज भी उसी रफ्तार से चलती थी जैसी 30 साल पहले चलती थी। पूरे कस्बे के लोग उन्हें "डाक बाबू" कहते थे।रामप्रसाद की जिंदगी में दो ही चीजें थीं