अध्याय 6: वह रातउस रात अंगद घर नहीं गया।वह स्टेशन के बाहर लगी एक लोहे की बेंच पर बैठा रहा।बारिश शुरू हो चुकी थी।हल्की-हल्की बूँदें प्लेटफ़ॉर्म की सीढ़ियों पर गिर रही थीं और पीली रोशनी में चमक रही थीं।उसकी हथेली अब भी बंद थी।अंदर वही चाँदी की अंगूठी थी।एम.उसने उसे फिर खोला।फिर देखा।फिर मुट्ठी बंद कर ली।दिमाग में मीरा की आखिरी बात गूँज रही थी—“याद करो।”लेकिन याद करे क्या?उसे अपनी ज़िंदगी याद थी।कम से कम उसे ऐसा लगता था।कॉलेज।पहली नौकरी।पहला बड़ा प्रोजेक्ट।अपने पिता से हुई आखिरी बहस।अपनी महत्वाकांक्षा।अपने सपने।सब कुछ।लेकिन जब भी वह 16 अगस्त 2016 के बारे में सोचता…उसके