PLATFORM - 4

अध्याय 4: समय के खिलाफअंगद की आँखें खुली थीं।लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।डिब्बे की पीली रोशनी सामने थी, लोग अपनी जगह बैठे थे, ट्रेन अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी—फिर भी उसे लग रहा था जैसे सब कुछ किसी मोटे शीशे के पीछे हो।उसने अपनी हथेलियाँ देखीं।काँप रही थीं।उसने मुट्ठी बाँधी।फिर खोली।फिर बाँधी।“शांत हो जा…”उसने खुद से कहा।लेकिन दिमाग में सिर्फ एक ही दृश्य घूम रहा था—दरवाज़ा।हवा।एक लड़की।और उसकी उंगलियों से बस एक सेकंड की दूरी पर छूटती हुई कलाई।अंगद ने आँखें बंद कर लीं।तभी ट्रेन की रफ्तार कम होने लगी।घोषणा हुई।अगला स्टेशन।अंगद ने तुरंत आँखें खोलीं।उसने