आर्यमन ने देखा कि अवनि उससे दूर सिमट रही है। वह समझ गया कि उसके पिछले किए की परछाईं अब भी अवनि के मन पर है। उसने धीमी आवाज़ में, कड़कड़ाते जबड़ों के बीच कहा:"अवनि... डरो मत। मैं... मैं बस तुम्हें सुबह तक ज़िंदा देखना चाहता हूँ। मुझ पर यकीन मत करो, पर अपनी जान मत हारो।"पहाड़ी की वह बर्फीली रात अब अपनी क्रूरता की चरम सीमा पर थी। आर्यमन, जो केवल एक बनियान में था, उस जानलेवा ठंड को और अधिक सह नहीं सका।वह अवनि से कुछ कहने के लिए अपने नीले पड़ते होंठ खोलने ही वाला था कि