इस हिस्से में शितिज की बेबस हालत, डर और ठाकुर साहब की चाल को थोड़ा और गहरा किया है, ताकि पाठक को महसूस हो कि शितिज अब सिर्फ गवाह नहीं, बल्कि खुद फँस चुका है। मैं पूरी रात सो नहीं सका। ठाकुर साहब की जिंदगी में ऐसे खतरनाक काम भी होते हैं, ये मैंने कभी सोचा तक नहीं था। मैं चुपचाप बिस्तर पर पड़ा छत को घूरता रहा। कुछ देर पहले मेरी आँखों ने जो देखा था, उसके बाद जैसे मेरी जुबान से बोलने तक की ताकत छिन चुकी थी। मैं खुद को एक पिंजरे में कैद ऐसे जानवर की