इस हिस्से को मैं आपकी कहानी के मूल भाव को रखते हुए थोड़ा अधिक उपन्यासात्मक, सहज और रहस्य पैदा करने वाले अंदाज़ में लिख रहा हूँ, ताकि आगे आने वाला ट्विस्ट और मजबूत लगे। मैं धीरे-धीरे ऑफिस का सारा काम सीखता जा रहा था। अब ज्यादातर समय ठाकुर साहब के साथ ही बीतने लगा था। शायद ही कोई मीटिंग ऐसी होती, जिसमें वो मुझे अपने साथ न ले जाते। चाहे वो कोई ऑफिशियल मीटिंग हो, बिजनेस से जुड़ी कोई मुलाकात हो या फिर उनकी निजी जिंदगी से जुड़ा कोई मामला—हर जगह मैं उनके साथ रहने लगा था। धीरे-धीरे उन्होंने अपने