ठाकुर साहब से मिलकर मुझे लगा जैसे मैं अपनी मंज़िल की पहली सीढ़ी चढ़ चुका हूँ। सीढ़ी इसलिए कहा, क्योंकि किसी की नौकरी करना मेरा सपना नहीं था। जो ठाठ की ज़िंदगी मैं जीना चाहता था, वह किसी की नौकरी करके तो मिलने वाली नहीं थी। असली मज़ा तो उस दिन आने वाला था, जब ठाकुर साहब अपना सब कुछ मुझे सौंपकर खुद किनारे हो जाएंगे। मैंने उसी दिन से उस दिन का इंतज़ार शुरू कर दिया था। कॉल सेंटर में किसी को बताना इतना ज़रूरी नहीं था। छोटी-सी नौकरी छोड़ना भी कोई इतना मुश्किल काम नहीं था। न किसी