“किसी को शांत होने के लिए कहने से पहले एक बार यह समझने की कोशिश कीजिए कि उस मुकाम तक पहुँचने से पहले उसने कितनी बातें चुपचाप सहन की होंगी।”आज सुबह मैं चाय के साथ अख़बार पढ़ रही थी।एक खबर पर मेरी नज़र रुक गई।“युवाओं की बात सुनिए… समझिए कि उनके भीतर इतना आक्रोश क्यों है।”मैंने उस खबर को एक बार पढ़ा।फिर दोबारा पढ़ा।लेकिन उसके बाद मेरा ध्यान अख़बार से हटकर लोगों की तरफ चला गया।आक्रोश की तरफ।और इस बात की तरफ कि हम किसी के गुस्से को देखकर कितनी जल्दी उसके बारे में फैसला कर लेते हैं।हम किसी को