भीड़ में अकेली - 4

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अध्याय–4 : अधूरी इच्छाएँ     रविवार की सुबह थी। आज महेश घर पर था। उमा ने सोचा, शायद आज कुछ अलग होगा। उसने नाश्ते में महेश की पसंद के आलू के पराठे बनाए, दही रखा, अचार निकाला और चाय की केतली मेज़ पर रख दी। महेश अख़बार के साथ बैठा था । एक हाथ में चाय का कप था, दूसरे हाथ में मोबाइल।"पराठे कैसे बने हैं?" उमा ने उत्सुकता से पूछा।महेश ने बिना ऊपर देखे कहा, "अच्छे हैं।"बस इतना ही। कभी-कभी एक शब्द भी पर्याप्त होता है, यदि उसमें अपनापन हो लेकिन केवल औपचारिकता से निकला हुआ शब्द पेट तो