कालू की पहाड़ी - 15

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कार्तिक उस मलबे से किसी तरह बाहर निकला, उसके शरीर पर जख्म थे, लेकिन उसका संकल्प हिमालय जैसा अडिग था।उसने आसमान की ओर देखा, सुबह होने में अब बहुत कम समय बचा था। घड़ी की सुइयाँ रात के 3:45 की ओर इशारा कर रही थीं।यह वही समय था जब अंधेरा अपनी पूरी ताकत लगा देता है क्योंकि उसे पता होता है कि रोशनी आने वाली है।कार्तिक के मन में बिजली की तरह विचार कौंध रहे थे, "सिर्फ 15 मिनट! अगर 4 बजे तक मैं पहाड़ी पर नहीं पहुँचा, तो कालू का तांडव मेरे दोस्तों के अस्तित्व को मिटा देगा।एक महान