गालियां और हम

भारतीय संस्कृति में गालियाँ : सामाजिक और साहित्यिक सन्दर्भ— विवेक रंजन श्रीवास्तवभाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती। वह समाज का आईना भी होती है। मनुष्य के भीतर जितने भाव हैं, भाषा में उनके उतने ही रूप मिलते हैं। प्रेम है, तो प्रार्थना है। करुणा है, तो आँसू हैं। क्रोध है, तो कटु वचन भी हैं। इन्हीं कटु वचनों का एक रूप है—गाली।पहली दृष्टि में गाली असभ्यता लगती है। पर संस्कृति का अध्ययन हमें बताता है कि किसी भी सामाजिक व्यवहार को केवल नैतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। उसके पीछे इतिहास भी होता है। समाजशास्त्र भी। मनोविज्ञान भी।