अध्याय–2 : एक घर, जहाँ सन्नाटा रहता है सुबह के छह बजे थे। अलार्म बजने से कुछ क्षण पहले ही उमा की आँख खुल गई। यह वर्षों की आदत थी। उसने धीरे से बिस्तर छोड़ा ताकि महेश की नींद न टूटे। खिड़की का पर्दा हटाया तो पूर्व दिशा में हल्की लालिमा फैलने लगी थी। शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं था, लेकिन उमा का दिन शुरू हो चुका था। रसोई में गैस जली। चाय चढ़ी। टोस्टर में ब्रेड रखी गई। प्रेशर कुकर में दाल चढ़ गई। मशीन की तरह उसके हाथ काम कर रहे थे। हर काम का समय