बचपन की मौलिकता और मौलिक प्रश्नों की मृत्यु

बचपन की मौलिकता और मौलिक प्रश्नों की मृत्यु   ​(वेदांत 2.0 का एक दृष्टिकोण)   ​मनुष्य जन्म के समय किसी धर्म, ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग, नरक, मोक्ष, पाप या पुण्य की अवधारणा लेकर पैदा नहीं होता। वह केवल अनुभव करने, देखने, सीखने और प्रश्न करने की अनंत क्षमता लेकर इस अस्तित्व में आता है।   ​बचपन में परिवार, समाज, शिक्षा और धार्मिक परंपराएँ उसे अनेक बनी-बनाई धारणाएँ सौंप देती हैं। ये धारणाएँ व्यक्ति की समझ परिपक्व होने से पहले ही उसकी मानसिक संरचना का हिस्सा बन जाती हैं। वह इन्हें स्वयं खोजकर नहीं पाता, बल्कि विरासत में प्राप्त करता है।