अमर समर्पण: एक अनकही दास्तान

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लेखिका "अनामिका"गाँव की गलियों में जब पैरों में पायल बांधे छह साल की नन्हीं मीरा दौड़ती, तो हवा में उसकी बेफिक्र हँसी गूँज उठती। माँ अक्सर रसोई के झरोखे से मुस्कुराते हुए उसे पुकारती, "मीरा! संभल के दौड़ो बेटा।"​मीरा पूरे गाँव में अकेले ही कभी तितलियों के पीछे भागती, तो कभी धूल में मिट्टी के खिलौने बनाती। पर ताज्जुब की बात यह थी कि गाँव का कोई भी बच्चा उसके साथ नहीं खेलता था। जैसे ही मीरा किसी बच्चे की तरफ कदम बढ़ाती, वह चीखते हुए दूर भाग जाता।​पापा के पुराने थैले में किताबों की कुछ कॉपियाँ सहेजकर मीरा हर