जीवन ही अंतिम सत्य

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जीवन ही अंतिम सत्य जीवन ही ईश्वर है। जीवन से अलग कोई दूसरा ईश्वर, आत्मा या परमात्मा नहीं। जीवन स्वयं ही दिव्यता की अभिव्यक्ति है। जब जीवन को उसकी संपूर्ण गहराई में जिया जाता है, तब भीतर केवल शुद्ध ऊर्जा, सहज आनंद और मौन शेष रह जाते हैं। जब दुःख को पूर्णतः स्वीकार कर जिया जाता है, तब वह दुःख नहीं रहता; वह परिवर्तन बन जाता है। जैसे सुख स्थायी नहीं है, वैसे ही दुःख भी स्थायी नहीं है। दोनों जीवन की सतह पर उठने वाली तरंगें हैं। आनंद केवल सुख से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि सुख और दुःख—दोनों की