तेरे हो गये हम - भाग 1

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सुबह की हल्की धूप गाँव के पुराने घरों पर चमक रही थी।18 साल की आशी वर्मा, हल्के गुलाबी सूट में, आँगन में झाड़ू लगा रही थी।चेहरे पर मासूमियत, दिल में दर्द—और ज़िन्दगी में न कोई अपना।माँ-बाप की मौत के बादवो अपने चाचा–चाची के साथ रह रही थी,जो उसे बेटी नहीं, बोझ समझते थे।“आशी! काम खत्म हुआ कि नहीं?”चाची की कड़क आवाज़ ने सुबह की शांति तोड़ दी।“जी चाची… बस कर लिया।”चाची ने घूरकर कहा,“पुरा दिन काम करवाउँगी तब ही कुछ सीखेगी तेरी माँ ने तो तुझे कुछ सिखाया नही!”आशी चुपचाप सर झुका लेती है। और उसकी आँखो से आँसू गिरने