ऊर्जा त्बा

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यजुर्वेद सूक्ति (5) की व्याख्या"इषे त्वा ऊर्जे त्वा"यजुर्वेद --1/1भावार्थ =-जीवन समृद्ध और शक्तिशाली बने। इसका पूरा मंत्र अर्थ सहितयजुर्वेद 1.1 का प्रथम मंत्रइषे त्वा ऊर्जे त्वा। वायवः स्थ। देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे। आप्यायध्वमघ्न्या इन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा। मा वः स्तेन ईशत माघशंसः। ध्रुवा अस्मिन् गोपतौ स्यात। बह्वीः यजमानस्य पशून् पाहि॥भावार्थहे अन्न और पोषण देने वाले साधनों! मैं तुम्हें जीवन-निर्वाह (इषा) और बल, ऊर्जा तथा सामर्थ्य (ऊर्जा) के लिए ग्रहण करता हूँ।हे जीवनदायी शक्तियों! तुम सब सदा गतिशील और उन्नतिशील रहो। परमात्मा सविता तुम्हें श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त करे।तुम बढ़ो-फूलो, स्वस्थ रहो, रोगों और क्षय से मुक्त रहो तथा