कर्म फल

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कर्म फलआसमान में रूई जैसे बादल जगह-जगह बिखरे हुए थे। सूरज ढलने को था। पेड़ का पत्ता भी नहीं हिल रहा था। जुलाई महीने की उमस भरी शाम थी। सरोज अपनी बालकनी में बैठी ढलते हुए सूरज को देख रही थी। सोच रही थी - "इस समय सूरज भी निस्तेज हो गया है अपने ढलान पर। उसी तरह मेरी उम्र भी ढल रही है। बुढ़ापा दस्तक दे रहा है।"सुबह की बात याद आते ही उसकी आंखें भर आईं। उसकी बहू सीमा उसे बासी रोटी और चाय का कप पकड़ाकर ऑफिस चली गई थी। न पूछा कि रात कैसी कटी, न दवाई