कुछ दिन पहले सहसा मृत्यु ने इस कहानी की सबसे निर्मल, सबसे भोली और सबसे सुकुमार पात्र ' रोहिणी ' को निगल लिया था और फिर उसकी विक्षुब्ध आत्मा प्रतिशोध के लिए हुंकार उठी थी, फिर शुरू हुआ मौत का तांडव पर विनाश का एक चक्र जैसे अब पूरा हो चुका था। लेकिन गाँव वाले अब तक उस भय से थर्राये हुए थे इसलिए तो जब बाबा बटेश्वर आये तो पूरा गाँव उनके शरण में आने के लिए उमड़ पड़ा। बाबा आकर पुराने बरगद के पेड़ के नीचे आसन जमा कर बैठ गए ... पूरा शरीर भस्म से रमा हुआ ...