MTNL की घंटी - 32

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2002 की दिल्ली…उस समय चुनिंदा घरों में ही MTNL का फोन बजा करता था।घंटी की हर टन-टन के साथ साँसें ऊपर-नीचे होती थीं।खुशियाँ हों या ग़म, जीना-मरना सब उसी फोन से तय होता था।इसी घंटी ने महक और देव की मोहब्बत की शुरुआत भी करवाई थी।2013 तक आते-आते दिल्ली बदलने लगी।पुराने हवेलीनुमा घर अब फ्लैट्स में बदल गए।मेट्रो दिल्ली की धड़कन बन चुकी थी और MTNL लगभग इतिहास हो गया था।उसकी जगह मोबाइल फोन ने ले ली थी।फेसबुक और व्हाट्सएप पर अनजाने लोग अपनों से ज़्यादा क़रीब हो गए,और अपने ही धीरे-धीरे दूर होते चले गए।इस साल ने देव और