चाँदी का कंगनबरसों पुराने राजस्थान के एक छोटे-से कस्बे "चाँदपुर" में एक हवेली थी, जिसे लोग "स्मृतियों की हवेली" कहते थे। हवेली की दीवारें बूढ़ी हो चुकी थीं, लेकिन उनमें रहने वाली अस्सी वर्षीया दुर्गा देवी की आँखों में अब भी उम्मीद की चमक थी।दुर्गा देवी के पास एक छोटी-सी लकड़ी की संदूकची थी। उसमें न सोना था, न हीरे-मोती। उसमें रखा था केवल एक साधारण-सा चाँदी का कंगन।लेकिन उस कंगन की कीमत दुनिया के किसी भी खज़ाने से ज़्यादा थी।वह कंगन उनकी माँ ने उन्हें विदाई के समय पहनाया था और कहा था—"बेटी, यह सिर्फ़ गहना नहीं, हमारे परिवार