विष अमृत..."आज जाने की ज़िद ना करो, यूं ही पहलू में बैठे रहो।" कनु के स्वर की मधुर स्वरलहरियां कमरे में तैर रही थी। सब लोग मगन होकर सुन रहे थे। निशा रजत के कंधे पर सर रखे आंखें बंद करके गाने का पूरा आनंद ले रही थी, बल्कि गाने की पंक्तियों को साकार कर रही थी। आकाश दीवार से सर टिकाए सपनों में खोया था। उसका संपूर्ण वजूद एक अक्स से आग्रह कर रहा था 'आज जाने की ज़िद ना करो' नमिता खोई-खोई सी नजरों से जाने कहां देख रही थी। आकाश ने पहलू बदलने के बहाने से एक भरपूर