मैं अभी भी वहीं बैठी थी। मन तो बाहर जाने का था, लेकिन मैंने खुद को रोक लिया था। पता नहीं क्यों, मुझे लगा कि बिना किसी वजह के उसके पीछे जाना सही नहीं होगा। इसलिए मैं चुपचाप अपनी जगह पर बैठी रही।कुछ ही देर बाद मेरी कज़िन बोली, "चल, बाहर चलते हैं।"इस बार मैं भी उसके साथ उठ गई।जैसे ही हम बाहर पहुँचे, देखा कि मेरे मामा, मामी और परिवार के कुछ बड़े लोग बाहर खड़े होकर बातें कर रहे थे। माहौल बिल्कुल हल्का-फुल्का था। सबके चेहरों पर मुस्कान थी।उसी समय मामा ने हम सब बच्चों को देखकर मुस्कुराते