यजुर्वेद सूक्ति~(1) की व्याख्या"त्रयम्बकं यजामहे"त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्"यजुर्वेद --3/60भावार्थ --हम तीन नेत्रों वाले भगवान् शिव की उपासना करते हैं जो सुगन्ध की भाँति हर स्थान पर समान रूप से व्याप्त हैं।हम जिस मंत्र का उल्लेख कर रहे हैं, वह प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र है। इसका प्रामाणिक वैदिक पाठ इस प्रकार है:ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मा अमृतात्॥यजुर्वेद संदर्भ: अध्याय 3, मंत्र 60 (कुछ संस्करणों में यह तैत्तिरीय संहिता 1.8.6 अथवा ऋग्वेद में भी मिलता है। विभिन्न शाखाओं में मंत्र क्रमांक भिन्न हो सकता है।)सरल अर्थ: हम तीन नेत्रों वाले भगवान रुद्र (शिव) की उपासना करते हैं, जो सुगंध के समान