बस धीरे-धीरे कॉलेज के मुख्य गेट से बाहर निकल चुकी थी। खिड़कियों के बाहर लखनऊ की सड़कें पीछे छूटती जा रही थीं, जबकि बस के अंदर हँसी-मज़ाक और बातचीत का माहौल था।कोई गाने सुन रहा था, कोई सेल्फी ले रहा था, तो कोई आने वाले एक महीने की ट्रेनिंग को लेकर उत्साहित था।अर्जुन हमेशा की तरह सबसे अलग था।वह बस की सबसे आख़िरी सीट पर, खिड़की के पास जाकर बैठ गया। एक हाथ खिड़की पर टिका था और दूसरे हाथ में मोबाइल। कभी वह किसी मेडिकल नोट्स को देख रहा था, तो कभी बाहर गुजरते हुए नज़ारों पर उसकी नज़र