अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 17

  • 468
  • 162

**भाग सत्रह: जंगल की वो खामोश गवाही**सिटी ऑडिटोरियम की उस चकाचौंध और हज़ारों की भीड़ से भागकर कबीर अपनी बुलेट पर सवार हुआ। पल्लवी के उन अजनबी लफ़्ज़ों ने उसके सीने में एक ऐसा नासूर पैदा कर दिया था जो अब बर्दाश्त से बाहर था। वह बाइक को पागलों की तरह दौड़ाते हुए शहर के सबसे आखिरी छोर पर उस वीरान जंगल में ले आया, जहाँ पुरानी यादों का साया भी डरता था।बरगद के उस विशाल पेड़ के नीचे बैठकर कबीर का वह सख्त मुखौटा चकनाचूर हो चुका था। वह अपनी गलती के बोझ तले दबकर दहाड़ें मार-मार कर रो