**भाग छ: टूटे ख़्वाब, बिखरी दुनिया**कमरे के उस घुटन भरे सन्नाटे को पीछे छोड़कर कबीर बाहर उस तेज़ बारिश में आ खड़ा हुआ था। आसमान जैसे आज पूरी ताकत से रो रहा था और बारिश की मोटी, सर्द बूंदें कबीर के चेहरे पर किसी बेरहम चाबुक की तरह पड़ रही थीं। उसकी शर्ट पूरी तरह भीग कर उसके शरीर से चिपक गई थी, लेकिन वह अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिला। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपना चेहरा आसमान की तरफ उठा लिया।कबीर के चेहरे पर बहता हुआ पानी सिर्फ बारिश का नहीं था। उसकी