ऋगुवेद सूक्ति-- (55) की व्याख्या "ऋतं च सत्यं च"ऋगुवेद--10/190/1अर्थ --नियम और सत्य ही (जगत का) आधार है।आपने जो मंत्र दिया है — “ऋतं च सत्यं च” — यह ऋग्वेद के मंडल 10, सूक्त 190, मंत्र 1 (10.190.1) से लिया गया है। यह बहुत गहरा दार्शनिक अर्थ रखता है। मूल मंत्र--ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत।ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥ शब्दार्थ--ऋतम् (ऋत) = ब्रह्मांड का शाश्वत नियम / cosmic orderसत्यम् (सत्य) = सत्य, जो अटल और वास्तविक हैतपसः = तप या सृजनात्मक ऊर्जाअभि + इद्धात् = प्रकट हुआ / उत्पन्न हुआ भावार्थ (सरल अर्थ)--ऋत (नियम) और सत्य (सच्चाई) — ये दोनों ही तप (सृजन शक्ति) से