दिन भर की अंतहीन भागदौड़ और मानसिक थकान ने जब शरीर को पूरी तरह पस्त कर दिया, तो मैं भारी कदमों से छत पर आ गया। ढलती हुई शाम अपनी सुनहरी रोशनी समेट रही थी। थकान इतनी गहरी थी कि हड्डियों में तक में एक मीठा सा दर्द महसूस हो रहा था, मानो शरीर अब जवाब दे रहा हो। ऐसे में मेरी आरामदायक कुर्सी और एक कप कड़क चाय ही मेरे इकलौते हमसफर थे। सूरज क्षितिज की ओट में छिपने ही