रूम नं. 407भाग – 2 : बंद दरवाज़े के पीछेआरोही का पूरा शरीर डर से काँप रहा था।उसकी आँखें सामने लगे धूल भरे नंबर पर टिक गई थीं—407कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।अंदर इतना अँधेरा था कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।लेकिन वही आवाज़...वही धीमी, ठंडी फुसफुसाहट..."तुम आ ही गई..."आरोही के पैरों ने जैसे ज़मीन पकड़ ली।वह भागना चाहती थी...लेकिन उसका शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था।उसने काँपती आवाज़ में पूछा—"क... कौन है वहाँ?"कुछ सेकंड तक बिल्कुल सन्नाटा रहा।फिर कमरे के अंदर से किसी के हल्के-हल्के हँसने की आवाज़ आने लगी।"ह... ह... ह..."वह ज़ोर से नहीं हँस रही