जयगुरु क्या दीक्षा आवश्यक है? — शास्त्र, संत और मानवता की दृष्टि से एक विचारभारतीय सनातन आध्यात्मिक परंपरा में "दीक्षा" केवल एक धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि जीवन के रूपांतरण का आरंभ मानी गई है। दीक्षा का वास्तविक अर्थ है—अज्ञान से ज्ञान की ओर, असंयम से संयम की ओर तथा ईश्वर-विमुखता से ईश्वराभिमुखता की ओर अग्रसर होना।आज अनेक लोग प्रश्न करते हैं—क्या केवल भगवान का नाम लेना पर्याप्त है या आध्यात्मिक जीवन में दीक्षा भी आवश्यक है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें शास्त्रों, संतों और मानव जीवन के अनुभव की ओर देखना होगा।सबसे पहले उपनिषदों का मत देखते