लेखक की कलम से-एक बच्चे की सहज मुस्कान से शुरू होकर वयस्क जीवन के अदृश्य बोझों तक पहुँचता यह ललित निबंध सहजता, स्वीकृति और मानवीय जुड़ाव पर चिंतन करता है।अदृश्य भार और एक मुस्कानक्या कभी ऐसा हुआ है आपके साथ?किसी सार्वजनिक स्थान पर प्रतीक्षा करते हुए अचानक आपकी नज़र एक छोटे बच्चे से मिल जाए। वह अपनी माँ की गोद से झाँककर चमकती आँखों से आपको देख रहा हो, मानो आप दोनों के बीच कोई अनकहा परिचय पहले से मौजूद हो। आप मुस्कुरा दें और वह खिल उठे। फिर बिना किसी भाषा, बिना किसी परिचय और बिना किसी प्रयोजन के