महक चबूतरे पर बैठी थी, पैरों के पास फैली रजनीगंधा की खुशबू हवा में घुल रही थी।उसके होंठों पर धीमे-धीमे शब्द बह रहे थे—" जो ख़तम हो किसी जगह, यह ऐसा सिलसिला नहीयही कहोगे तुम सदा...के दिल अभी भरा नही..."पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई,"अभी-अभी आई हो… अभी न जाओ छोड़कर…"महक ने पलटकर देखा—देव वहाँ खड़ा था, आँखों में वही पुराना अपनापन, वही बिन कहे वादा।देव उसके पास आकर बैठा, और बिना कुछ कहे उसे अपनी बाहों में खींच लिया। दोनो अपना अपना एक बुरा दौर छोड़ कर नयी मोहबत की दुनिया मे कदम रख रहे थे।उस पल में कोई