केंद्र और परिधि

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केंद्र और परिधिमनुष्य का जन्म केंद्र में होता है, पर उसका जीवन धीरे-धीरे परिधि पर फैल जाता है। केंद्र उसका मूल है, परिधि उसका विस्तार। समस्या परिधि में नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य परिधि को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेता है और केंद्र को भूल जाता है।केंद्र में केवल होना है। परिधि में बनना है। जितना अधिक बनने का संघर्ष होगा, उतनी ही केंद्र से दूरी बढ़ेगी। यही दूरी भय, चिंता, तुलना, अहंकार और पीड़ा का अनुभव कराती है।परिधि कोई पाप नहीं है। संसार कोई भूल नहीं है। जीवन की विविधता कोई दोष नहीं है।