अन्तर्निहित - 52

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 [52]वत्सर घर लौट रहा था तब वह मन ही मन अपने आराध्य श्रीकृष्ण का धन्यवाद करता रहा था। साथ साथ स्वयं को दोषी भी मान रहा था कि इतने दिनों तक वह कृष्ण की सेवा से वंचित रहा था। ‘हे कृष्ण! इतने दिनों तक मैं तुमसे दूर रहा। तुम्हारी सेवा नहीं कर सका। किन्तु तुम ही साक्षी हो कि एक क्षण भी मैं तुम्हारे स्मरण से विमुख नहीं रहा। यह सब तुम्हारी ही तो लीला है, तुम्हारा ही प्रपंच है। इसमें मेरा क्या दोष? अब मैं लौट आया हूँ। अब अविरल तुम्हारी सेवा में लगा रहूँगा। बस मुझ पर तुम कृपा